Wednesday, July 01, 2009

उसकी तस्वीर इन आंखों से जाती क्यों नहीं

उसकी तस्वीर इन आंखों से जाती क्यों नहीं,
उसके सिवा अब और कोई नज़र आती क्यों नहीं |

मिलने के बाद अब ये जुदाई कैसे सहें,
ये बात मेरे दिल को वो बताती क्यों नहीं |

साँसों के साथ अब तो धड़कनें हैं जुड़ चुकी,
दिल-ऐ-नादान को वो समझाती क्यों नहीं |

जिसका नक्श अब है मेरे मंज़र में बस चुका,
ख़्वाबों में आकर अब वो सताती क्यों नहीं |

रूठने की तमन्ना तो दिल में अब भी है बहुत,
संजीदगी से मुझको वो मनाती क्यों नहीं |

आवाज़ जिसकी रूह की पहचान बन चुकी,
हौले से पास आकर वो गुनगुनाती क्यों नहीं |

लबों का खुश्क होना अब यहाँ किसको है पसंद,
मुझे वो रेशमी ग़ज़ल फ़िर से सुनाती क्यों नहीं |

जिसकी हर अदा पे दोनों जहाँ निसार हैं,
छुपके देखके मुझको वो मुस्कुराती क्यों नहीं |

मेरे गम ख़ुद से बांटने की जिद वो करती है,
अपने आंसू मेरी आंखों से बहाती क्यों नहीं |

मुझे उससे और कोई शिकायत है नहीं लेकिन,
मुझसे वो प्यार करती है ये बताती क्यों नहीं |

उसकी तस्वीर इन आंखों से जाती क्यों नहीं,
उसके सिवा अब और कोई नज़र आती क्यों नहीं |

3 comments:

Urza said...

awesome!!!!!!

Ritesh said...

'Good work' tumhe kahe yaa bhabhi ko?

Alok Beel said...

bahut din baad koi acchi rachna padhne ko mili!! is kavita mein taazgi nazar aa rahi hai..!!lage raho