Thursday, October 23, 2008

मेरी सूनी पनाहों को निगाहों में सजा लो तुम,
लबों की अन-कही बातें जो हैं दिल में छुपा लो तुम,
समा ये जानशीन सा कह रहा रिमझिम घटाओं से,
मोहब्बत की दुहाई है, मुझे अपना बना लो तुम..

तेरी आँखों का जादू तेरी बातों की अदा है जो,
तेरी साँसों की गर्मी और धड़कन की सदा है जो,
ये वो लम्हा है जिसको वक़्त से मैंने चुराया है,
उसी पल में उसी आगोश में मुझको समा लो तुम..

मेरे इस आशियाँ में जाने कैसा गम का साया है,
मेरे अश्कों की चादर ने ये कैसा ज़ख्म पाया है,
तू मेरी रूह है, तू ख्वाब है, तू जान है मेरी,
तमन्नाओं का गुलशन आज महफिल में सजा दो तुम..

-- धविश

3 comments:

Vaibhav Rikhari said...

Ye jo lamha hai waqt se churaya maine .....waah waah kya likha hai ..subhaan allah.... maja aa gaya padh ke

Dhavish said...

Thanks a lot buddy :)

pranjal said...

great going sir..
maien aaj hi padha ye..
abey apni poems alag category mein likho naa..dhundhna padta hai aise mein..